ख़लिश

एक वक़्त था जब किसी का गम जीया था हमने,
आज अपनी खुशी में पराया कर दिया है हमको.
उनकी आँखों से जो अश्क छलके भी ना थे,
उन्हे अपनी आँखों में समाया था हमने.
हमने सोचा था वो हमारी किस्मत हैं,
और इसलिए उनके हाथों की लकीरों में अपना नसीब ढूँढते थे,
हाथ वो छुड़ा गये इस तरह,
की मेरी लकीरें भी साथ ले गये
अब वीरान है ये हथेलियाँ ,
और आँखों से अश्क उनके बहते हैं.

Aaina – Reflection of Urdu Poetry (4)

सुना था लोग बड़े दिलनवाज़ होते हैं
मगर नसीब कहाँ कारसाज़ होते हैं

सुना है पीरे-मुगा से ये बारहा मैने
छलक पड़े तो प्याले भी साज़ होते हैं

किसी की ज़ुलफ से वाबिस्तगी नहीं अच्छी
ये सिलसिले दीलेनादान दराज़ होते हैं

वो आईने के मुक़ाबिल हो जब खुदा बनकर
अदा-ओ-नाज़ सरापा नमाज़ होते हैं

‘अदम’ खुलूस के बन्दो में एक खामी है
सितम ज़रीफ़ बड़े जल्दबाज़ होते हैं

-अदम

मायने
दिलनवाज़ = दोस्त
कारसाज़ = काम बनाने वाला
पीरे-मुगा = शराब देने वाला बुज़ुर्ग
बारहा = बारबार
वाबिस्तगी = लगाव
दराज़ = लंबे
मुक़ाबिल = सामने
सरापा = सर से पाँव तक
ज़रीफ़ = चुटकुलेबाज़
खुलूस = खुले दिल वाला

एक मुलाक़ात

एक दिन मिल बैठे अपने दिल से हम,
कुछ उसकी सुनी, कुछ अपनी सुनाई,
कुछ थे खुशी क पल,
कुछ बाँटें आपस के गम.

दिल कभी हँस पड़ता,
कभी भर आता उसका गला
हम भी करते उससे क्या शिकवा
हमें तो खुद से ही थी हज़ारों गिला.

कभी उसको दिया सहारा हमने
कभी उसने हमें संभाला,
कुछ उसने दिए थे हमें दर्द,
कभी हमने था उसको छला.

अपनी नादानियों पे मिलके हम हसे,
अपने घावों पे मिलके लगाया मरहम,
अपनी वाफ़ाओं पे मुस्कुराए जहाँ,
जफ़ाओं पे आँखें हुई सार-शरम

तन्हा रहे हम कभी
और कभी दी अपने ही दिल को तन्हाई.

एक अरसा रहे साथ हम दोनो,
पर इस तरह कभी बात नही हुई.

अब तक का सफ़र…

कुछ छूट सा गया लगता है अतीत में,
जो कभी मेरी रूह का अंश सा लगता था.
कुछ खाली सा लगता है सीने में,
जो वक्त बेवक्त मुझे दर्द दिया करता था.

अब समय ने आवाज़ दी है,
आगे बढ़ना ही होगा.
कुछ ख्वाब जो टूटे हैं,
उनके टुकड़ो पर से गुज़रना होगा.

कुछ अनचाही ख्वाहिशें थी,
कुछ दूजे की आँखों के सपने थे,
कुछ अपने ही मन को बहलाने की बातें थी,
जो मेरी आँखों में बसते थे.

चाहत भारी नज़रो में
खुद का आईना भी धुँधलाया था.
अब जो ठोकर लगी है
तो भ्रम का शीशा टूटा है.

अब मनको फिर चाह हुई है
इक बार फिर उड़ने की,
इसी चाह में पंख फैलाए हैं
अंबर को फिर छूने की.

अतीत के पन्नो पे लिखे हैं जो लफ्ज़
साथ हरदम रहेंगे हर राह में.
उन परछाईयों को लेकिन
अब नही देखना मुड़कर.

आगे जो रास्ता कर रहा इंतज़ार
अब एक नया रास्ता है वो.
उसपर चलना है मुझे
अपने सपनो की ओर.

बाँह फैलाए कर रहें हैं
जो मंज़िलें मेरा इंतेज़ार,
उनपर करना होगा भरोसा
और खुद पे ऐतबार.

जो था अब तक का सफ़र
नही है वो नाकाम.
सिखा ही गया है ये
की नहीं कोई राह आसान.

Aaina – Reflection of Urdu Poetry (4)

देख तो दिल की जान से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है

गोर किस दिलजले की है ये फलक
शोला इक सुबह याँ से उठता है

सुध ले घर की शोले-ए-आवाज़
दूर कुछ आशियाँ से उठता है

बैठने कौन दे है फिर उसको
जो तेरे आस्ताँ से उठता है

इश्क एक ‘मीर’ भारी पत्थर है
बोझ कब नातवा से उठता है

– मीर तकी ‘मीर’

Aaina – Reflection of Urdu Poetry (3)

शाम समय एक ऊँची सीडीयों वाले घर के आँगन में
चाँद को उतरे देखा हमने, चाँद भी कैसा? पूरा चाँद

इंशा जी इन चाहने वाली, देखने वाली आँखों ने
मुल्कों मुल्कों, शहरों शहरों, कैसा कैसा देखा चाँद

हर इक चाँद की अपनी धज थी, हर इक चाँद का अपना रूप
लेकिन ऐसा रोशन रोशन, हँसता बातें करता चाँद

दर्द की टीस तो उठती थी पर इतनी भी भरपूर कभी
आज से पहले कब उतरा था दिल में इतना गहरा चाँद

हमने तो किस्मत के दर से जब पाए अँधियारे पाए
यह भी चाँद का सपना होगा, कैसा चाँद, कहाँ का चाँद

उनका दामन इस दौलत से खाली का खाली ही रहा
वरना थे दुनिया में कितने चाँदी चाँद और सोना चाँद

-ईब्ने इंशा

Aaina – Reflection of Urdu Poetry (2)

होंठो पे मुहब्बत के फसाने नही आते
साहिल पे समंदर के ख़ज़ाने नही आते

पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी
आँखों को अब भी ख्वाब छुपाने नही आते

दिल उजड़ी हुई इक सराय की तरह है
अब लोग यहा रात बिताने नही आते

क्या सोचकर आए हो मुहब्बत की गली में
जब नाज़ हसीनो के उठाने नही आते

आहबाब भी गैरों की आडया सीख गये हैं
आते हैं मगर दिल को दुखाने नही आते

डॉ. बशीर बद्र

Aaina – Reflection of Urdu Poetry (1)

वो दूरियों का रहे-आब पर निशान खुला
वो रेंगने लगी कश्ती, वो बादबान खुला

मिरे ही कान में सरगोशियाँ सुकूत ने की
मिरे सिवा कभी किससे ये बेज़बान खुला

समझ रहा था सितारे जिन्हे वो आँखें हैं
मिरी तरफ निगरान है कई जहाँ खुला

मिरा ख़ज़ाना है महफूज़ मेरे सीने मे
मैं सो रहूँगा यूँ ही, छोड़कर मकान खुला

हर आन मेरा नया रंग है, नया चेहरा
वो भेद हू जो किसीसे ना मेरी जान खुला

जज़ा कहे की सज़ा इसको बोलो-पर वाले
ज़मीन सीकुढती गई, जितना आसमान खुला.

-शाकेब जलाली

सरफ़रोशी की तमन्ना

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है ।
एक से करता नहीं क्यों दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल में है ।
रहबरे-राहे-मोहब्बत रह न जाना राह में
लज्जते-सेहरा-नवर्दी दूरि-ए मंजिल में है ।
यूँ खड़ा मकतल में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है?
ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।
खींच कर लाई है सबको कत्ल होने की उम्मींद,
आशिकों का आज जमघट कूंच-ए-कातिल में है ।
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है ।
है लिये हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हाथ जिनमें हो जुनून कटते नहीं तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भडकेगा जो शोला-सा हमारे दिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हम तो निकले ही थे घर से बांधकर सर पे कफ़न
जाँ हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम
जिंदगी तो अपनी मेहमाँ मौत की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
दिल मे तूफानों की टोली और नसों में इन्कलाब
होश दुश्मन के उडा देंगे हमें रोको न आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

-Ram Prasad Bismil




PS: I like this poem a hell lot. Most of us are just aware of the first two lines as it was used by our revolutionaries during the freedom struggle a lot. So just reproducing it here in its entirety.



सपने

वो जीवन् ही क्या जिसमे कोई सपना ना हो.

सपना भी ऐसा जो शायद ही पूरा हो सके.

सपने तो हम अक्सर देखते हैं, और उनमे से कई पुर भी हो जाते हैं.

पर वो सपना जो अधूरा हो!

जिसका ना कोई आगाज़ हो ना अंजाम.

ऐसे अधूरे सपने की शायद ही कोई कल्पना कर सके.

ऐसा सपना

जो हवा के एक झोंके से ऊड़ जाए,

जो पानी की एक बूँद से मिट जाए,

जो सागर की एक लहर से रेत की तरह बह जाए.

ऐसा सपना ही सपना है.

फिर वो सपना जो पूरा हो जाए, सपना कहाँ रह जाए?

PS: This was my first ever attempt towards writing. Written in 6th grade on a scrappy piece of paper in school, during a free class. I held on to that paper for a long time. Till it was in pieces and then I wrote it in my diary. I have shared this with very few people till date. But now I thought that I could share it here. Few words were changed and the sentences were given better form when I copied it to my diary. But the feelings have been left untouched. I really don’t remember why I wrote this. But I do remember staring at it wide eyed after I had finished it. May be that was the day when I discovered myself. This is really close to my heart. Really really close to my heart.