Aaina – Reflection of Urdu Poetry (4)

सुना था लोग बड़े दिलनवाज़ होते हैं
मगर नसीब कहाँ कारसाज़ होते हैं

सुना है पीरे-मुगा से ये बारहा मैने
छलक पड़े तो प्याले भी साज़ होते हैं

किसी की ज़ुलफ से वाबिस्तगी नहीं अच्छी
ये सिलसिले दीलेनादान दराज़ होते हैं

वो आईने के मुक़ाबिल हो जब खुदा बनकर
अदा-ओ-नाज़ सरापा नमाज़ होते हैं

‘अदम’ खुलूस के बन्दो में एक खामी है
सितम ज़रीफ़ बड़े जल्दबाज़ होते हैं

-अदम

मायने
दिलनवाज़ = दोस्त
कारसाज़ = काम बनाने वाला
पीरे-मुगा = शराब देने वाला बुज़ुर्ग
बारहा = बारबार
वाबिस्तगी = लगाव
दराज़ = लंबे
मुक़ाबिल = सामने
सरापा = सर से पाँव तक
ज़रीफ़ = चुटकुलेबाज़
खुलूस = खुले दिल वाला

Aaina – Reflection of Urdu Poetry (4)

देख तो दिल की जान से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है

गोर किस दिलजले की है ये फलक
शोला इक सुबह याँ से उठता है

सुध ले घर की शोले-ए-आवाज़
दूर कुछ आशियाँ से उठता है

बैठने कौन दे है फिर उसको
जो तेरे आस्ताँ से उठता है

इश्क एक ‘मीर’ भारी पत्थर है
बोझ कब नातवा से उठता है

– मीर तकी ‘मीर’

Aaina – Reflection of Urdu Poetry (3)

शाम समय एक ऊँची सीडीयों वाले घर के आँगन में
चाँद को उतरे देखा हमने, चाँद भी कैसा? पूरा चाँद

इंशा जी इन चाहने वाली, देखने वाली आँखों ने
मुल्कों मुल्कों, शहरों शहरों, कैसा कैसा देखा चाँद

हर इक चाँद की अपनी धज थी, हर इक चाँद का अपना रूप
लेकिन ऐसा रोशन रोशन, हँसता बातें करता चाँद

दर्द की टीस तो उठती थी पर इतनी भी भरपूर कभी
आज से पहले कब उतरा था दिल में इतना गहरा चाँद

हमने तो किस्मत के दर से जब पाए अँधियारे पाए
यह भी चाँद का सपना होगा, कैसा चाँद, कहाँ का चाँद

उनका दामन इस दौलत से खाली का खाली ही रहा
वरना थे दुनिया में कितने चाँदी चाँद और सोना चाँद

-ईब्ने इंशा

Aaina – Reflection of Urdu Poetry (2)

होंठो पे मुहब्बत के फसाने नही आते
साहिल पे समंदर के ख़ज़ाने नही आते

पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी
आँखों को अब भी ख्वाब छुपाने नही आते

दिल उजड़ी हुई इक सराय की तरह है
अब लोग यहा रात बिताने नही आते

क्या सोचकर आए हो मुहब्बत की गली में
जब नाज़ हसीनो के उठाने नही आते

आहबाब भी गैरों की आडया सीख गये हैं
आते हैं मगर दिल को दुखाने नही आते

डॉ. बशीर बद्र

Aaina – Reflection of Urdu Poetry (1)

वो दूरियों का रहे-आब पर निशान खुला
वो रेंगने लगी कश्ती, वो बादबान खुला

मिरे ही कान में सरगोशियाँ सुकूत ने की
मिरे सिवा कभी किससे ये बेज़बान खुला

समझ रहा था सितारे जिन्हे वो आँखें हैं
मिरी तरफ निगरान है कई जहाँ खुला

मिरा ख़ज़ाना है महफूज़ मेरे सीने मे
मैं सो रहूँगा यूँ ही, छोड़कर मकान खुला

हर आन मेरा नया रंग है, नया चेहरा
वो भेद हू जो किसीसे ना मेरी जान खुला

जज़ा कहे की सज़ा इसको बोलो-पर वाले
ज़मीन सीकुढती गई, जितना आसमान खुला.

-शाकेब जलाली