वो उस शाम से लौटी है
जब काँपते हुए, झरोखे में खड़ी थी,
वो उस शाम से लौटी है
जब मन से बरसात में भीगी थी।

जब बारिश की बूँदों से
उसने अपने आंसुओं को भिगोया था
हाथों को फैलाकर 
किन्ही मोतियों को बटोरा था।

नंगे पैरों की उँगलियों को
ठण्ड से सिकोड़ती थी
अपने हाथों से ही
खुद को जकड़ती थी।

नन्ही बूँदों को 
नन्ही आँखों से निहारा था
फिर आँखों को टिमटिमा कर
किन्ही सपनो को झकझोरा।था

पेड़ों की डालियों पे लटकते,
सरसराते पत्तों की तरह
मुस्कुराहटें घोली थी उसने हवाओं में 
अज़ान के कलामों की तरह

एक अरसा हो गया आज
उन मुस्कुराहटों को
उन पेड़ो से गुज़रती हवाओं को
ज़मीं पे बिखरी घटाओं को ।

रुकी थी की कभी तो
उस शाम को वापस वो लाएगी
उन बिखरते मोतियों से
आँखों के सपने फिर सजाएगी।

इंतज़ार की उम्र जब हो चली
वो शाम तो आयी नहीं
तो अपने सपने समेटकर
वो उस शाम से लौट आयी।

6 thoughts on “वापसी

  1. its confusing in the course whether its sad that she lost her dreamy night or better that she had let it go to move on with her life.

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