Aaina – Reflection of Urdu Poetry (4)

सुना था लोग बड़े दिलनवाज़ होते हैं
मगर नसीब कहाँ कारसाज़ होते हैं

सुना है पीरे-मुगा से ये बारहा मैने
छलक पड़े तो प्याले भी साज़ होते हैं

किसी की ज़ुलफ से वाबिस्तगी नहीं अच्छी
ये सिलसिले दीलेनादान दराज़ होते हैं

वो आईने के मुक़ाबिल हो जब खुदा बनकर
अदा-ओ-नाज़ सरापा नमाज़ होते हैं

‘अदम’ खुलूस के बन्दो में एक खामी है
सितम ज़रीफ़ बड़े जल्दबाज़ होते हैं

-अदम

मायने
दिलनवाज़ = दोस्त
कारसाज़ = काम बनाने वाला
पीरे-मुगा = शराब देने वाला बुज़ुर्ग
बारहा = बारबार
वाबिस्तगी = लगाव
दराज़ = लंबे
मुक़ाबिल = सामने
सरापा = सर से पाँव तक
ज़रीफ़ = चुटकुलेबाज़
खुलूस = खुले दिल वाला