वो दूरियों का रहे-आब पर निशान खुला
वो रेंगने लगी कश्ती, वो बादबान खुला

मिरे ही कान में सरगोशियाँ सुकूत ने की
मिरे सिवा कभी किससे ये बेज़बान खुला

समझ रहा था सितारे जिन्हे वो आँखें हैं
मिरी तरफ निगरान है कई जहाँ खुला

मिरा ख़ज़ाना है महफूज़ मेरे सीने मे
मैं सो रहूँगा यूँ ही, छोड़कर मकान खुला

हर आन मेरा नया रंग है, नया चेहरा
वो भेद हू जो किसीसे ना मेरी जान खुला

जज़ा कहे की सज़ा इसको बोलो-पर वाले
ज़मीन सीकुढती गई, जितना आसमान खुला.

-शाकेब जलाली

5 thoughts on “Aaina – Reflection of Urdu Poetry (1)

  1. Thank you Ma'am but this one is not mine… I cannot take the credit even in my dreams. AAINA will contain urdu poetry by famous authors. Just an effort.

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